जादू-मंतर By प्रशांत
सूरज की पहली किरण सी आहट है तुम्हारी, चांद भी तुमसे नूर चुराए वो सादगी है तुम्हारी, दिन और रात रोशन है तुमसे मेरा, महसूस करना मेरे दिल की धड़कन, मुझसे ज्यादा इसमें धड़कन है तुम्हारी। फूल भी तुमसे खुशबू चुराए, तुम्हारे स्पर्श से हवा भी महक जाए, तारे भी सारे तुमसे ही जगमगाए, कोई तुमसे कैसे न मोहब्बत करे, कोई कैसे कब-तक नजरें चुराए। तुम्हारी हर झलक में है रब की कोई कारीगरी, तुम्हारी मुस्कान से होती है सुकून की तस्करी, तुम्हारी आँखें जैसे चुपचाप बात कर जाती हैं, और यही बातें रूह में मेरी उतर जाती है। तुम्हारे अहसास भर से दिल खुश हो जाता है, पर पता नहीं क्यूं एक झलक फिर भी चाहता है, तुम्हारी एक झलक में है जादू मंतर सब और ये दिल खुशी से झूम उठता है, बिन तुम्हारे सब अधूरा है आंखों के इंतेज़ार से दिल बेचैन हो उठता है।
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