इश्क और तुम By प्रशांत
कभी कभी मै सोचता हूं क्या मैं सच में तुम्हारे लायक हूं, या फिर मैं अपनी बिन मतलब कविताओं जैसा नालायक हूं। तुम हो एक साफ सुंदर गंगा सी पावन प्रिय, मैं हूं कहीं कच्छ की घाटी में पड़ा कीचड़ प्रिय। तुम हो किसी की मुकम्मल मोहब्बत सी, मैं हूं किसी का ठुकराया हुआ प्यार प्रिय। तुम हो किसी मशहूर शहर में परफेक्शन की दुकान प्रिय, मैं किसी छोटे गांव में खंडर पड़ा मकान प्रिय। तुम्हारा लिखा तो हीरे की भांति चमकता है, मैं लिखूं तो करना पड़ता है उजाला प्रिय। तुम्हारे दिखने भर से दिन भर की थकान दूर हो जाती है, खुशबू आती है उन हवाओं से जो तुम्हें छूकर आतीं हैं। तुम्हारे बारे में सोचूं तो खुद के सारे काम भूल जाते हैं, इतना न सताओ चलो कहीं घूम आते हैं। शुक्रिया 🙏🏻
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