तुम और बचपन By प्रशांत
उसके पास न होने की अब याद बहुत सताती है, सुबह से शाम हो जाती है, पर उसकी आवाज नहीं आती है। यूं तो दुनियाभर में अनंत खुशबू हैं, पर उसकी जादुई महक से ये सब फीकी पड़ जाती हैं। तुम्हें करीब से देखने के लिए आँखें बेचैन रहती हैं, बेवजह बेचारी गुमसुम सी उदासी सहती हैं, तुम दिखोगे किसी दिन बहुत करीब से, बस इसी ख्याल में सुबह खुलने की जल्दी में रहती हैं। उसके दिल में भी मुझसे मिलने की ऐसी हो आस, वो मेरे साथ हर दिन ऐसे जिए जैसे कल न हो उसके पास। उसके साथ अपना बचपन जीने का मन करता है, ये चार लोग, ये समझदारी सब परे रख के खुलकर हंसने को मन करता हैं। वो जब मुझे देखे तो उसे खुद में और मुझमें कोई फर्क न दिखे, मैं जब भी निहारूं उसे तो मुझसे ज्यादा मेरे जैसी वो दिखे। वो खुद में ओर मुझमें कोई फर्क न करे, बातें करे वे फिजूली की, कोई तर्क न करे। वो जिसके साथ सब अच्छा सा लगने लगता है, वो जिसके साथ एक जिंदगी और जीने का मन करता है, वो जिसके साथ दुनिया भर की ख्वाहिशें पूरी लगने लगती हैं, वो जिसके साथ फिर से बचपन जीने का मन करता है। शुक्रिया।
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