जिंदगी और चाय By प्रशांत
अच्छा सुनो, इतना क्यूँ परेशान रहते हो वे फिजूली की बातें सोचकर, उठो और खुल के जियो आंखों के आंशू पोंछकर। इतना भागते हो कभी सांस लो पल भर ठहरकर, क्यूं मरते हो चार लोगों की बातों से बहककर। बरसात का मौसम है, क्यूँ छुपते हो किसी छत की आढ़ में, क्या सोच रहे हो आओ न भीगे साथ में। मैं चाय नहीं पीता लेकिन सोचता हूं कुछ पल तुम्हारे साथ इसका स्वाद लूं, क्या पता इसी बहानें खुद को तुम्हारे आईने में ढाल लूं। इतना क्यूँ सोचते हो कल क्या होगा, सोचने वाली बात तो ये है कि लोगों का ये हाल सैय्यरा देख के है तो तेरे नाम 2 देख के क्या होगा। 😅 बताते क्यों नहीं हो उसको के वो तुम्हारे लिए कितना जरूरी है, उसके बिना जीना भी तो बेफिजुली है। भाग रहे हो जिन सपनों के पीछे कभी सोचा है अगर रह गए अधूरे तो कैसे रहोगे, ये दुनियाँ की बातें, रिश्तेदारों के ताने, अपनों से जब नजरें नहीं मिला पाओगे तो कैसे सहोगे। इसलिए कहता हूं मानो मेरी बात और चलो चाय पीएं, एक बुझी हुई सिगरेट को हाथ में पकड़कर कुछ पल अपने लिए जिएं। आज के लिए इतना ही। शुक्रिया 🙏🏻
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