अंतर्मन By प्रशांत
सुनो साहब, तुम यूं बेचैन न हुआ करो रूठने से किसीके, तमाम गुफ्तगू से इतर इल्म दूसरों को भी होना चाहिए रूठने से किसीके। जिनकी फिक्र तुमने खुद से ज्यादा की, खुद के सारे कामों को परे रख के की, उसने एक लम्हा भी तुम्हारे लिए निकाला क्या? जिसको देखे बिना तुम्हे चैन नहीं पड़ता था, वो पल भर के लिए भी तुम्हारे लिए तड़पा क्या? घर के काम तो तुम्हें करने में मौत आती है, उसके कामों के लिए तुमने एक बार भी नकारा क्या? हमेशा तुम ही क्यूं मरते हो, कुछ गलत न हो इस बात से इतना क्यूँ डरते हो? कभी खुद के साथ बैठो, खुद से खुद का हाल पूछो पूछो उसके बचपन के सपने क्या चाहते थे, अभी जो भी चल रहा है, यूं रुकना तो नहीं चाहते थे। कलम - प्रशांत चौहान
Ad
Poetry Books 50% Off
Bestselling collections from top poets
Shop Now →
