फरेबी इश्क By प्रशांत
आज की सुबह कुछ कह रही थी मुझसे, सूरज की किरणे ताने दे रहीं थी खुदसे, खुद को करके बर्बाद, किसी पर होकर न्योछावर क्या पा लिया उससे, वो इतना खुश है जैसे आजाद हुआ हो मुझसे। उसके दिखाए हुए ख्वाबों को अब अकेले याद कर रहा हूं मैं, खुद के आंसुओं से उसकी यादों का स्वेटर बुन रहा हूं मैं। उसने किया था कभी साथ ना छोड़ने का वादा, अब बोल रही है, तुम उम्मीद कर बैठे कुछ ज्यादा, दोनों के बदले का प्यार था मेरा, मैनें कब कहा तुम भी करो प्यार आधा। उससे मोहब्बत होने से पहले वो अपना लगा था मुझे, बस इसी गलतफहमी में सब कुछ मान लिया था तुझे। आज नहीं तो कल एहसास तुम्हें भी होगा, किसी के साफ दिल को दुखाने का दर्द तुम्हें भी होगा, दिल को यूं उम्मीद अब किसी से फिर न होगी, ये मोहब्बत की बारिश अब किसी पे दुबारा ना होगी। इतना सब होने के बाद, प्यार की भीख मांगने के बाद ये समझ आया कि, जिस मोहब्बत की उम्मीद मैंने तुमसे कि, वो मोहब्बत मुझे अपनेआप से खुद करनी पड़ेगी।
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