Ankahi💔
वो कहता था – “तुम मेरी जान हो,” मैंने उन शब्दों को अपना सम्मान मान लिया। अब न पीछे जाना मुमकिन है, न ही सवालों का जवाब मिलना संभव है। हम कभी सच में मिले ही नहीं, ना हाथ थामा, ना दो पल साथ बैठे। फिर भी वो लम्हे, वो यादें अब भी पास हैं, गाए हुए गीत और उनके अहसास हैं। मैंने तो सब कुछ उसे सौंप दिया, ना दर्ज़ा देखा, ना रंग-रूप तौला। पर उसने कभी मेरा पक्ष न लिया, क्या बस इतना ही प्यार था—यही सोच लिया। मैं टूटी, बिखरी, फिर भी सँभलती रही, उसके वादों पर ही कदम बढ़ाती रही। आज भी इंतज़ार है कि शायद वो आए, पर सच है—वो तो बहुत आगे बढ़ जाए। इन आँखों ने अब बहना छोड़ दिया, थककर दर्द को छुपाना सीख लिया। न कोई पूछे हाल मेरा, न याद करे, कौन मेरा दर्द समझे, कौन पास रहे? कैसे उभरना है—मुझे नहीं पता, कैसे बढ़ना है आगे—कोई राह नहीं दिखता। बस इतना जानती हूँ, चाहे जितनी दूरी हो, मेरा प्यार अब भी उतना ही सच्चा और पूरा है। और हाँ, अफ़सोस रहेगा हमेशा, शायद मुझमें ही कोई कमी रह गई। मैं आज भी वहीं खड़ी हूँ—सिर्फ वहीं, जहाँ कभी उसने कहा था—“तुम मेरी जान हो।”
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