anjuMan-E-alFaaz
ज़ख्म बेशक है मेरे सीने में और बेहिसाब है, मगर दिल में उसकी खातिर इक एहतराम भी है। बड़ी उल्फत थी मुझे कि उसको मोहब्बत हो मुझसे, और मोहब्बत-ए-शिकस्ती का मुझको मलाल भी है। दिल क़त्ल हुआ मेरा अंजाम ना पूछो, तुम उस दिलरुबा का नाम ना पूछो। बस इतना जानो , हमलावर इक हुस्न परी थी, मैं इश्क में गर मारा गया ये उसकी जादूगरी थी। इक उम्मीद थी, इक उल्फत थी बाद इज़हार-ए -मगर इक बेकशी भी थी । वो नहीं मानती मगर, उसके ना मानने से क्या होता है सच ये है कि उससे बेइंतहां इश्क था मुझको और बेशुमार दिललगी भी थी, उसने कर दिया इनकार इसमें हर्ज ही कैसा, इश्क में मुकर गई, शायद उसकी कोई बेबसी थी। बीती बातों पर अब पर्दा डालो, उस मासूम पर कीचड़ ना उछालो, बस इतना जानो दुनिया वालों वो मोहब्बत थी मेरी और आखिरी थी। "धर्मेंद्र चौधरी "
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