जनहरण घनाक्षरी छन्द(8,8,8,7)
दिनकर दहकत,दिनभर धधकत, हरदम लहकत,अति तपन रहे। जन जन छड़पत, कहरत -हहरत, तिल तिल तड़पत, जल बदन रहे। भयवश दुबकत,शहर न निकलत, तनिक न हरकत,मन छछन रहे। रवि रिपु बनकर,तपन उगलकर, धरणि गरम कर,वह मगन रहे। नरेंद्र सिंह 18 .06.2024 तापमान 45 डिग्री
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