मनहरण छंद(8,8,8,7)
मन का हो जो उद्गार,अंदर से फूटे ज्वार , लय हो व मात्राभार , वही होती कविता। मन को झंकृत करे, तन पुलकित करे; जो प्रसन्नचित्त करे, वही सही कविता। छंद अलंकार रहे, उत्तम विचार रहे; शब्द अविकार रहे, उसे कहें कविता। नियम विधान माने, छंद का भी ज्ञान जाने; मात्रा-वर्ण पहचाने , वही लिखे कविता। नरेंद्र सिंह 25.03.2024
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