549 वीं काव्य संध्या
आज हिंदी काव्य सम्मेलन में खालिक हुसैन परदेशी से होली सुनने का अवसर मिला। इन्हें मैं गजलकार समझते थे। पर आज आश्चर्य हुआ जब वे पूर्ण लय धुन के साथ होली गाए, "अंखिया बहे नीर, मथुरा नै आवs हे कन्हैया, अंखिया बहे नीर, अंखिया हो, अंखिया बहे नीर, मथुरा नै आवs हे कन्हैया।।" वह भी इतना बेहतरीन कि मत पूछें।होली भी कृष्ण भक्ति पर गाए। काव्य पाठ के बाद उनसे मैंने पूछा शहर में रहकर एक मुस्लिम होकर भी इतना बढ़िया होली कैसे गाए। उन्होंने बताया कि उनका घर काबर (आंती )है। गाँव में खेती बारी भी है। पहले गाँव में व्यास थे। होली,रामायण आदि का पाठ जब होता है तब उसके अग्रगणी को व्यास कहा जाता है। खालिक जी ने बताया कि राणायण, सुखसागर,प्रेमसागर आदि हिन्दू धर्मग्रंथो का भी अध्ययन वे किए हैं। उनके गुरु भी मिश्रा जी थे। हालांकि व्यास रहने और हिन्दू धार्मिक गायन के चलते उन्हें अपने समाज के लोगों का विरोध भी झेलना पड़ा था।इस गप्प के दौरान कुछ और राम पर आधारित होली भी गुनगुनाये। नरेंद्र सिंह 01.03.2025
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