51 .मानवता की सेवा कर
लाख चाहे तप कर या सैंकड़ों यज्ञ कर या जितना चाहे ब्रत कर अगर गरीबों के काम न आया मानवता की सेवा न कर पाया तो अन्य सभी व्यर्थ कर्म है लाचार की सहायता ही धर्म है। भले कुछ यज्ञ,तप कर या न कर पर निरीह जीवों पर दया जरूर कर। नरेंद्र सिंह 25.01.2024
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