28/१०/२०२४
हालात ऐसे भी थे कभी कि चेहरे से मुस्कान जाती न थी, मैं उसके पास जाता था जबकि वो बुलाती न थी। मुझे लगा एक तरफा रहा सारा सफर, अब मिला कोई वैसा ही इश्क करने वाला, जिसकी ख्वाहिश कभी केवल ख्वाबों तक थी। न जाने किस गलतफहमी में जी रहा था मैं, वो तो इश्क करना जानती ही न थी। मैं सजाता रहा इश्क की अनेकों मूर्तें क्या जानता था वो खरीदना जानती न थी। अगर जानता की अंजाम यूं होगा वफादारी का, तो जाता ही न पास इतना, उसको क्या वो तो बुलाती न थी। दर्द तो दिल वालों को होता है, सुना है वो पत्थर की है, इश्क की वो धुन तो कभी उसके दिल से आती न थी। अब चेहरे पर एक तिनका खुशी नहीं, कभी वक्त था कि जाती न थी।।
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