26/०९/२०२४
जिंदगी के शोर गुल से परेशान मैं अक्सर, एक शांत किनारा ढूॅंढा करता हूॅं। तैरने को समंदर में सहारा ढूॅंढा करता हूॅं, प्रेम की चिंता में बह रहा,प्रेम से दूर होने को, प्रेम का सहारा ढूॅंढा करता हूॅं। सहारे में उसका साथ, उसका हाथ, मांगने को बेकरार हुआ रहता हूॅं। जिंदगी के शोर गुल से परेशान मैं, शांत किनारा ढूॅंढा करता हूॅं। किनारे पर उसका सहारा ढूॅंढा करता हूॅं।।
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