संक्रन्दन छंद (222 122,1222)
1 यदि अनुभूति मन में, जगाना है। तो रिश्ते सही से, निभाना है।। जग में एक ये जो, खजाना है। इसको ही हमें तो,सजाना है।। 2 रहता हूँ अकेले, चमन खोकर । लिखता हूँ सही मैं, निडर होकर ।। जीवित हूँ अभी तक,बहुत सहकर । रिश्ते लोग तोड़े, उरग कहकर।। 3 लोगों का न तो दिल, दुखाया हूँ मैं न कभी किसी का, चुराया हूँ।। लेखन में सदा मैं, सदाचारी। कवि तो मात्र करता, अदाकारी।। नरेन्द्र सिंह, गया
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