संक्रन्दन छंद (222 122,1222)
यदि अनुभूति मन में, जगाना है। तो रिश्ते सही से, निभाना है।। जग में एक ये जो, खजाना है। इसको ही हमें तो,सजाना है।। रहता हूँ अकेले, चमन खोकर । लिखता हूँ सही मैं, निडर होकर ।। फिर भी लोग कहते,मुझे विषधर। रिश्ते तोड़ते हैं,उरग कहकर।। लोगों का न तो दिल, दुखाया हूँ । मैं न कभी किसी का, चुराया हूँ।। लेखन में सदा मैं, सदाचारी। कवि तो मात्र करता, अदाकारी।। नरेन्द्र सिंह
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