संक्रंदन छंद( 222-122, 1222)
शीर्षक- सब कुछ प्रभु का क्षिति जल वायु पावक, गगन सारा। प्रभु तेरा दिया है, श्वसन धारा।। सारे जीव प्राणी, तुम्हारा है। सबके तुम जगत पति, सहारा है।। परमेश्वर तुम्हारा, करूँ वंदन। पूजाभक्ति से मैं , करूँ चंदन।। प्रभु तेरी कृपा से, मिला दमखम । बनकर तुम सहायक, रहे हरदम।। जब तुम साथ मेरे,कमी कैसी। मस्ती है धरा पर, थमी जैसी।। मानव तुम सदा ही,भजन करना। रक्षक प्रभु बनेगा, नहीं डरना।। नरेन्द्र सिंह,21.03.2025
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