साधना (मधुमालती छंद, 2212,2212
ममता मयी माँ ज्ञान दे, मुझको यही वरदान दे। रचना करूँ मैं छंद की, खुशबू रहे मकरन्द की।। साहित्य की हो साधना, मेरी यही है कामना। नित नित यही है प्रार्थना, करबद्ध मेरी याचना।। रचना लिखूँ मैं छंदमय, कविता लगे आनंदमय। श्रोता कहे प्यारी लगी, पाठक कहे न्यारी लगी । साधक बनूँ मैं भक्त बन, आशीष दें हे श्रेष्ठ जन। लेखन सतत चलता रहे,कविता सुमन खिलता रहे।। नरेंद्र सिंह
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