20. रूह के रिश्ते
●●● ज़िस्म की.. आग़ भडक़ती है... वो बुझ़ भी जाती है। इश़्क की लौ.. द़िलों में जलती है... सदा-सदा के लिये ।। हद़ें तलाश.. ना कर, 'अयन ' हयात-ए-फ़ानी में। अज़ल हैं.. रूह के रिश्ते... हैं दो ज़हाँ के लिये।। ●●● ©deovrat ‘अयन’ 28.06.2018
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