20 लोकतन्त्र या लूटतंत्र
लोकतन्त्र में न कोई राजा है,न कोई गुलाम होता है; सभी बराबर हैं, बस यह कहने भर आसान होता है। जनता झक मारती हैं, यहां दो जून की रोटी के लिए; तन ढकने के लिए,अदद कपड़े और लँगोटी के लिए। पूरी जिंदगी यहाँ गरीब जीते हैं,अनेकानेक दुर्गत लिए; तरसते चल बसते हैं,माथे पर एक छोटी छत के लिए। पर देखिए शानो शौकत,गजब है जन प्रतिनिधियों की; आलीशान फ्लैट इनके, कमी नहीं सम्पदा निधियों की। जीतते ही देखते बनता है,ठाट-बाट इनकी राजशाही; सुरक्षा के घेरे में रहना,लक्जरी वाहनों से आवा जाही। जिन्हें सायकिल भी नसीब नहीं थी, कभी अतीत में; वे सात पुश्तों की व्यवस्था कर लेते हैं,एक ही जीत में। नेता अमीर हुए, आम लोग गरीब हुए, इस भ्रष्टतंत्र में; कहना व्यर्थ है कि सभी बराबर है ,इस लोकतन्त्र में।। नरेंद्र सिंह 1 3.01.2024
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