अगर मैं उड़ सकता [ 2 ]
कभी-कभी बदलते इंसानो की दुनिया में इंसानो से दूर पक्षियों की तरह आसमान पर स्वच्छंद मैं उड़ सकता तो कितना अच्छा लगता । उड़ते -उड़ते जब थक जाता तो किसी जंगल और फिर नदी के पास जाकर सुकून के चार पल व्यतीत करता और फिर पक्षियों की भांति आसमान के करीब विचरण करता । कितनी अदभुत दुनिया होती वो चारो ओर बिखरी प्रकृति न कोई तनाव न शिकवा न शिकायत , बस स्वच्छंद जीवन । काश मैं उड़ सकता उन पंख के सहारे ऊपर जाकर तब देखता नीचे का वो नजारा जहां की इंसानियत कहीं खो गई । कोई दे दे मुझे पंख मै भी उड़ना सीख लूं ।
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