माघ की काली अंधेरी रात -2
सुनसान गली में बस मेरे पैरों की सरसराहट, तंग गली के कोने पर सुनी मैने कुछ आहट। जब पीछे मुड़कर आया , अंधेरे की सिवा कुछ न मैने पाया। अब कदम मेरे जैसे रेल लाइन की मीटर गेज, कदमों के साथ साथ आहट भी होने लगी तेज़। एक बार फिर मैं पीछे मुड़कर आया, कुछ दूर सामने सफेद कपड़ों में एक सख्श को सामने पाया। मैने पूछा कौन है ,दबी आवाज़ में मेरी एक चीख निकल आई, उस अनजान सफेद मूर्त से कोई भी आवाज़ न आई। एक बार फिर मैने जोर से आवाज़ लगाई, संकरे काले कोने में वो गायब हो गई परछाई। आंखे मेरी खुली , सांस मेरी अटक गई, जैसे निश्चल पैरों से ज़मीन खिसक गई। चप्पल सिर पर उठा कर मैने ऐसे दौड़ लगाई, अगली सांस घर के दरवाजे पर ही आई। रजाई ओढ़कर पकड़ की मैने खाट, जोर जोर से शुरू किया हनुमान चालीसा का पाठ। पूरी रात मैं भगवान का नाम जपता रहा, डर के मारे पूरा शरीर कांपता रहा। अगले दिन देर तक मै जाग न पाया, हालत देखकर घरवालों ने डॉक्टर को बुलाया, डॉक्टर ने थर्मामीटर लगाया, और 102° बुखार बताया, उस दिन के बाद मैं कभी देर रात को घर से बाहर जा नहीं पाया।
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