19. सक़ून-ए-दिल
●●● तनहाईयों का भी, कितना अज़ीब आल़म है। फिज़ा ख़ामोश है, सक़ून-ए-दिल भी कुछ कम है।। जह़न प अक़्स नक़्स है, दीदार-ए-यार का। उनको भुलाने के लिये, ‘अयन’ इक उमर भी कम है।। ●●● ©deovrat ‘अयन’ 27.06.2018
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