सार छन्दः(16,12 मात्रा)
शीर्षक: पेड़ लगाएं,धरती बचाएं पीपल ,नीम ,वट विटप रोपें,यदि जान बचाना हो, अब मत सोएं हम सब चेतें ,न कोई बहाना हो। बढ़ रहा ताप भू पर काफी,अब तो नर सब जागो, करो हरित धरती माता को, न सत्कर्म से भागो।। तप रही धरा बनकर शोले, सनिकट प्रलय घड़ी है, बाढ़ सुखाड़ आ रहे भारी, आफत बड़ी खड़ी है। अब भी वक्त सुधरने का है, पूर्ण हरी धरती हो , हर तरफ रहे अब हरियाली, नहीं कहीं परती हो।। नरेंन्द्र सिंह 19.05.2024
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