13. नूर-ए-महताब
●●● द़रख्तों में छुपा है या तो फिर अब्र में कहीं। महताब से रोशन है आसमान और जम़ीं।। बाअद़ब चला करो, मिरे गु़लशन मे हवाओं। उसकी रेशमी ज़ुल्फों से लिपटना कभी नही ।। वो श़ोख हैं, क़मसिन है,वो ऩूर-ए-हयात है।। नादानियों से अपनी, उसे सताना कभी नही ।। या मुझ से हैं अद़ावतें या कुछ ओर बात है। रोश़न ‘अयन’ वो चाँद अब दिखता नहीं कहीं।। द़रख्तों में छुपा है या तो फिर अब्र में कहीं। मह़ताब से रोशन है आसमान और जम़ीं।। ●●● ©deovrat ‘अयन’ 17.06.2018
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