चंबा -1
चंबा से ठाकुर परिवार का बुलावा आया, सुनकर तन मन हर्षाया। बैग पैक करके शुरू की तैयारी, ट्रेन और बसों की करनी थी सवारी। ट्रेन ने पठान कोट तक पहुंचाया, बस स्टैंड पहुंचते ही चंबा की बस को सामने पाया। ऊंचे ऊंचे पहाड़ देखकर मन थोड़ा घबराया, गोल गोल घूमती सड़कों ने सिर को चकराया। बनीखेत में चाय पानी के लिए कंडक्टर ने बस को रुकवाया, उतरते ही पहले मेडिकल स्टोर को पाया। सिर न चकराने की ली दवाई, अभी ओर करनी थी पहाड़ों की चढ़ाई। शाम 6 बजे तक पहुंच गए चंबा, सुंदर पहाड़ों को देखकर हुआ बड़ा अचंभा। चंबा की वादियों में हिमालय मुस्काता है, बदलो से ढका पहाड़ , मन को हर ले जाता है। बहती यहां रावी नदी , मधुर गीत गाती है, ठंडे पानी को छूते ही तबीयत हरी भरी हो जाती है। पहाड़ों की गोद में बसता शहर, फूलों से सजी गलियां, छोटे छोटे पौधों पर मुस्का रही है फलियां। शाम को पहाड़ों की पीछे छिपता सूरज, रात हल्के हल्के कदमों के साथ आगे बढ़ रही, पहाड़ों पर बने घरों में रोशनी सितारों सी चमक रही। रात होते ही धीरे धीरे बढ़ने लगी सर्दी, शांतिप्रिय लोग यहां के, प्रकृति के साथ उनकी अलग ही है हमदर्दी।
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