शायरी [ 1 ]
बुत तुम, अप्सरा तुम, कहकशां तुम, कायनात तुम हर सूं जब तुम तो क्यूं न उल्फत हो समीम - ए - कल्ब शुक्रिया कि आया तू नज़र ज़ालिम वगरना ढूँढता रहता मंदिर - मस्ज़िद में तुझे मानिंदे - आवाम ख़्वाबों का भी ख्वाब है तेरा मेरा मिलन पर दिल में रहेगी तू सदा बुत बनकर खिड़की पर उन्हें देखता हूँ हर रोज़ मेरी अब कोई रात अमावस नहीं होती जब भी उन्हें देखा एक मदहोशी सी छा गई एक मैखाना साथ लेकर चलती है वो कायनात हो कहकशां हो तुम मेरी चाँद - सितारों से अब मुझे क्या लेना - देना
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