गणात्मक दोहा ल 03/05/2025
मगण (222)- ( बातूनी) बातूनी समझे सदा,चिल्लाने में शान। हंगामा नित-नित करे,मोहल्ले हैरान।। यगण (122)- ( छबीला) स्वयं छबीला जो बने,रखे गुमानी आन। मूँछ नुकीली वह रखे,उसे लखेरा मान।। रगण (212)-( चंचला) चपल चतुर जो चंचला, धरे फालतू वेष। कर्म-धर्म हो दानवी,नहीं कामिनी शेष।। सगण (112)-( अपना) अपना-अपना मत करो, समझो सबको खास। जननी सबकी धरा है, सबमें प्रभु का वास।। तगण (221)-( आनंद) जीवन भर आनंद से, रहो सदा आबाद। अपने भी संतुष्ट रहो, अन्य न हो बर्बाद।। जगण (121)- (विराट) रह विराट उर का सदा, त्यागो सभी विकार। अपना कर्म सुधार लो,दिल का बनो उदार।। भगण (211)- ( मंगल) मंगल मूरत राम प्रभु, तारण कारण आप। आकर ईश्वर अब हरो, दारुण संकट ताप।। नगण (111) (अथक) विनय अथक करते रहो, भजन-मनन दिन रात। नमन चरण प्रभु का करो, सरल हृदय रख भ्रात।। नरेंद्र सिंह
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