आख़िरी मोहब्बत
माना कि तुम्हें चाहने वालों का हुजूम बड़ा है, मगर क्या मुझे अपनी आख़िरी उल्फ़त बनाओगे? हाँ, करते होंगे कई ख़ुद को तुम पर क़ुर्बान, मगर क्या मुझे अपनी खूबसूरत मंज़िल बनाओगे? भुलने होंगे तुम्हें अब तक के तमाम कसमें-वादे, क्या ये आख़िरी पैमाँ तुम मेरे नाम कर पाओगे? आज़माइशें भी होंगी, सब्र की राहें भी लंबी होंगी, क्या सुकून की ख़ातिर ये दरिया पार कर जाओगे? अम्बर का हर चमकता सितारा मुक़द्दर नहीं होता, क्या मेरी मद्धम रौशनी में भी बसर कर पाओगे? वक़्त बदलेगा, मौसम भी कई रंग दिखाएगा, क्या तब भी तुम मेरा हाथ थामे रह जाओगे? जब लफ़्ज़ साथ छोड़ेंगे और ख़ामोशी बोलेगी, क्या तुम मेरी ख़ामोशियों को भी समझ पाओगे? जब दुनिया तुम्हें मुझसे बेहतर चेहरे दिखाएगी, क्या तब भी मेरी रूह में अपना अक्स पाओगे? गर हो तुम तैयार हर इक कसौटी की ख़ातिर, तो मैं भी अपनी तक़दीर में तुम्हें ही लिखूँगी साहिल। बताओ,, क्या मुझे अपनी आख़िरी मोहब्बत बनाओगे?
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