बेरासों का किस्सा-धन्नी पहलवान
धन्नी पहलवान ने एक पेड़ लगाया महुआ रामा शंकर पंडित के खेत में उसी पेड़ के कारण धन्नी मारे गए गाँव के बाहर मालापूर बधार में। किस्सा है गाजीपुर के ग्राम बेरासों का तब जात पात नहीं था सबमें भाईचारा था पंडित के खेत में अहीर ने लगाया था पेड़ रोज की राम राम और महुआ का सेवा था । बधार था तो गाँव के पशु भी विचरते थे गाय भैस बकरी प्रेम से घास चुगते थे एक दिन रामाश्रय यादव की बकरी आयी महुआ की पत्तियों से अपनी भूख मिटाई। धन्नी ग़ुस्से में रामाश्रय से भीड़े अकेले देखते-देखते बतकही में हाथापाई हो गयी तभी अचानक एक भाले का वार हुआ धन्नी मूर्च्छित हो गिरे प्राणपखेरू उनके उड़े। तब से धन्नी का आत्मा सबको दिखता था वो मरने के बाद भी महुआ की रक्षा करता था पहलवान के भूत का गाँव में चर्चा चहूँओर था शाम हुई नहीं की बधार रोज खाली हो जाता था। पंडित जी के नाती को भूत प्रेत पर विश्वास न था नाम सत्या था तो बिना साक्ष्य के स्वीकार न था एक दिन की दोपहर में ले टांगी महुआ काट दिया न जाने अब होगा क्या इसी भय में दिन रात बिता। अगला दिन सुहाना था धन्नी का अतापता नहीं था भीड़ थी खेत में किसी को पेड़ कटने का विश्वास न था किशोर सत्या के साहस ने पूरे गाँव का डर हटाया था फिर से गाँव में सब सामान्य हुआ बधार मुस्काया था।
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