दस्तक
स्याही की लकीरों से जब मेरी तकदीर बुने गए, आलता के लाल रंग में ख्वाब मेरे चुने गए। पायल पहना दी रिवाज़ ने,कहा यही रीत है, पर इन घुंघरुओं ने पूछा मेरी उड़ान की कीमत क्या यही है? खामोश फर्श पर सदियों से निशान छोड़ती आयी हु, हर कदम पे एक रिवाज़ की जंजीर तोड़ती आई हु। आज खामोश घुंघरुओं को मैने आवाज़ देना सिख लिया है, दबे हुए पाओं ने फ़र्श पर एतराज़ करना सिख लिया है।
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