बचपन
नन्हीं सी ख़्वाहिशें, छोटी फ़रमाइशें, कितना आसान होता अगर हम बच्चे होते। न मन में कोई तूफ़ान, न कोई संजीदा जाल, जिधर भी नज़र जाती, खुशियाँ होतीं बेशुमार। ज़िद कर लेते अपनी पसंदीदा बातों की, और कभी थककर यूँ ही सो जाते बिना बिस्तर-सिरहाने के। रूठे को मनाना कितना आसान होता, और फिर इतराकर रूठ जाना भी अज़ीज़ होता। न छल, कपट, द्वेष, न कोई दुर्व्यवहार होता, लड़-झगड़कर भी हर मसला अपने आप सुलझा होता। कौन क्या कर रहा है, कैसे जी रहा है - न इसकी फ़िक्र होती, टीवी, खेल, घूमना-फिरना, ये खाना, वो पीना -बस यही दुनिया होती। बारिश में भीगना भी किसी जश्न से कम न होता, और कागज़ की नाव में पूरा समंदर क़ैद होता। छोटी-छोटी बातों में दिल से हँस लेते, और बिन वजह हर किसी को अपना कहते। न दौलत की तलब होती, न शोहरत का गुमान होता, बस मिल जाए खूब खिलौने यही एक अरमान होता। अब तो हर चेहरा नकाब चढ़ाकर मिलता है, हर मुस्कान के पीछे कोई ज़ख्म पलता है। सच, कितना आसान होता, अगर हम बच्चे होते।
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