अगर कभी लिखूँगा
अगर कभी लिखूँगा, तो दर्द का बयान लिखूँगा, मुस्कुराते चेहरों के पीछे छुपा तूफ़ान लिखूँगा। जो हर हाल में कहता है — “मैं बिल्कुल ठीक हूँ”, मैं उसके टूटे सपनों का पूरा आसमान लिखूँगा। नहीं लिखूँगा सिर्फ़ कामयाबी के किस्से दुनिया में, हार कर भी जो खड़ा रहा, उसका स्वाभिमान लिखूँगा। लिखूँगा वो रातें भी, जब आँसू तकिया भिगोते थे, और सुबह उठकर फिर हँस दे, ऐसा इंसान लिखूँगा। जो अपने दर्द छुपाकर सबको हिम्मत देता है, मैं उस ख़ामोश चेहरे की सच्ची मुस्कान लिखूँगा। नहीं चाहिए शोहरत मुझे झूठे अल्फ़ाज़ों की, मैं अपनी रूह के हर ज़ख्म का सम्मान लिखूँगा।
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