। बंद कमरा ।
बंद कमरे की सजावट,बनावट सी है, मन की बात अब , दिखावट सी है, कैसे करे कोई हल्का,मन का बोझ अपना जब अपनों में ही गैरो वाली मिलावट सी है। माँग होगी तुम्हारी तब किसी के पास जब कोई अपना नहीं, क्या लगा तुम्हे अजीज हो तुम सबके? ये तो अब किस्मत की लिखावट सी है। किस उम्मीद में थे तुम? के चाहेगा कोई तुम्हे, नादान हो तुम और ये झूठे ख्वाब, तुमसे और इश्क़ ? ये तो रंजीश सी है।
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