पुरुषों की ख़ूबसूरती
पुरुषों की ख़ूबसूरती भी कमाल होती है… ख़ुद को हर पल रूआब में रखते, वो माथे की सिकन भरी लकीरें कमाल होती हैं। आसमान समेटे वो काले टीके-सी आँखें, जाने कितने राज़ छुपाए - कमाल होती हैं। रौब दिखाती, जीवन जीती वो नासिका, हर साँस में एक अलग शान लिए - कमाल होती है। हाय, वो धड़कनें, ख़्वाहिशें, ख़्वाब छुपाते लफ़्ज़, उनकी ख़ामोश अधूरी दुआ कमाल होती है। हिम्मत दिखाती, और किसी एक पर चुपचाप पिघल जाती वो बाँहें - कमाल होती हैं। अब क्या कहूँ उनकी ख़ूबसूरती को, चेहरे को हवा की शरारत से चूमती ज़ुल्फ़ें, सच में बेमिसाल होती हैं। थककर भी “मैं ठीक हूँ” कह देने की मुस्कुराती ख़ामोशियों की वो आदत भी कमाल होती है। मोहब्बत बेहिसाब करते हैं, मगर महफूज़ दिल में छिपाये रखने की सादगी भी कमाल होती है। और जब किसी अपने के लिए झुक जाएँ, तब उनकी लड़खड़ाती अकड़ भी बेमिसाल होती है। सच, पुरुषों की ख़ूबसूरती भी कमाल होती है। उनके सब्र, उनकी हिम्मत, अपनों को सम्हालने की कला और गिरकर भी संभल जाने का हुनर - कमाल होता है।
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