मोहब्बत
समंदर की लहरें, उसकी पलकों का उठकर गिरना। मिट्टी में घुली अत्तर की ख़ुशबू, उसकी साँसों का छूकर गुज़रना। दुनिया के तमाम गुलाब, उसके होंठों की सुर्ख़ मुस्कान। अशोक के लहलहाते पत्ते, उसकी ज़ुल्फ़ों की शाम में ठहरते। मंदिर की घंटियाँ, उसके कानों में लटकती बालियाँ। इंद्रधनुष में फूलों के रंग, उसकी काँच की चूड़ियों में सिमटे संग। मन को शांत करती सरगम, उसके पैरों में बंधी पायल की खनखन। सँवरती तक़दीर, उसकी नटखट मुस्कुराहट। मेरा नशा— उससे मोहब्बत।
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