बुज़ुर्गों की सेवा
पुराने कपड़ों में उन्हें एक टूटे हुए कपाट में छोड़ दिया, कभी मखमल-सी रंगीन दुनिया देखी थी जिसने। अपनों को भी मलमल से सजाया था। बेचारे बुज़ुर्गों को एक अखरोट की लाठी देकर, वीराने दास्तरख़ान में, बेस्वाद फीके खाने के साथ छोड़ दिया। शान से खुद तो मनाते ईद, दीवाली, क्रिसमस, होली, पर उस सूखे पिंजर को काला टीका बनाकर एक कोने में फेंक दिया। समय ढलेगा एक दिन यूँ तो सबकी ख़ातिर, हम भी, तुम भी, हाँ हम सब ही, बुज़ुर्ग होंगे जीवन चक्र के ख़ातिर। थोड़ा तर्क-वितर्क इसलिए करते जाओ, और बुज़ुर्गों की सेवा करते जाओ। देखो, बच्चे भी देख यही सीखेंगे, शायद कल ये देख तुम्हें अपनायेंगे।
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