पसंदीदा किताब
वो ना मेरी पसंदीदा किताब जैसा है, जाने कितनी दफ़ा पढ़ चुकी, फिर भी नया सा है। उसके पन्नों से अजब सी दोस्ती है दिल की, जैसे वो मुझसे भी ज़्यादा मुझे समझता सा है। एक भीनी-सी ख़ुशबू बसती है उसमें, उसकी खोज मेरी अपनी कस्तूरी सी लगती है। यूँ तो हर मतला मेरी रूह में बसा है, फिर भी हर बार नई सी गुदगुदाहट देता है। आख़िर तक पहुँच न जाऊँ इसलिए, हर हरफ़ को यूँ दोहराती हूँ- कि वो मेरी अपनी ज़ुबान सा लगने लगा है। मजबूरन आख़िरी लफ़्ज़ पढ़कर, फिर नए सिरे से उसे गले लगाती हूँ | वो ना मेरी पसंदीदा किताब जैसा है।
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