चिंगाड़ी आँखें
बह गए सपने जो सजाए थे साथ मिलकर खूब विवरण में अपने सबसे खूबसूरत लम्हों में; सुनहरे चमकती दोपहरों से लेकर काली गहरी रातों में वक्त का पता ही न चल, और अब रह गई है तो सिर्फ यादें ऐसी कल्पना की जिसको अपना भविष्य माना था पर अब भूत बनके सताते है।
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