नया रिश्ता
नया रिश्ता बनाना क्यूँ करें हम, पुराने ज़ख्म सजाना क्यूँ करें हम। जो बातें ख़त्म होनी थीं, वो हो लीं, उन्हें फिर से उठाना क्यूँ करें हम। न तुम अपने, न हम अपने रहे अब, ये धोखा फिर निभाना क्यूँ करें हम। जो दिल टूटा तो समझ आया ये आख़िर, किसी को दिल में लाना क्यूँ करें हम। वफ़ा, एहसास, क़ुर्बानी—ये लफ़्ज़, अब इनका नाम लेना क्यूँ करें हम। हमें तन्हाइयों से दोस्ती है, किसी को पास लाना क्यूँ करें हम। ये दुनिया खुद से ही ऊबी हुई है, इसे फिर से मनाना क्यूँ करें हम। जो कल तक साथ थे, अब अजनबी हैं, उन्हें आवाज़ देना क्यूँ करें हम। हमारे पास भी कुछ कम नहीं था, मगर अब कुछ बचाना क्यूँ करें हम। जो सच है वो सभी को चुभ रहा है, इसे हरदम छुपाना क्यूँ करें हम। न कोई ख़्वाब अब आँखों में बाकी, तो फिर आँखें सजाना क्यूँ करें हम। ये दिल हर मोड़ पर टूटा है अक्सर, इसे फिर आज़माना क्यूँ करें हम। जहाँ हर शख़्स मतलब से जुड़ा हो, वहाँ दिल को लगाना क्यूँ करें हम। हमें मालूम है अंजाम इसका, तो फिर शुरुआत करना क्यूँ करें हम। न कोई सुनने वाला, न समझने, किसी को हाल सुनाना क्यूँ करें हम। जो अपने ही नहीं थे वो कभी भी, उन्हें अपना बताना क्यूँ करें हम। ये आदत बन गई है सहने की अब, किसी से दर्द बाँटना क्यूँ करें हम। जहाँ हर बात पर तौहीन मिलती, वहाँ इज़्ज़त बचाना क्यूँ करें हम। 'भूपेंद्र' अब यही बेहतर है शायद, किसी से दिल लगाना क्यूँ करे
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