बताओ न, कौन मना करता है तुम्ह!
तुम कभी तो तड़पती होगी, बताओ न, कौन तड़पाता है तुम्हें। तुम कभी तो बिखरती होगी, बताओ न, कौन समेटता है तुम्हें। किसी को तो तुम निगाहों से गिराती होगी, बताओ न, कौन निगाहों पर बिठाता है तुम्हें। किसी का नाम तुम्हारे सुर्ख होठों पर आता होगा, बताओ न, कौन यह एहसास दिलाता है तुम्हें। कभी तो दामन तुम्हारे उरोजों से सरकता होगा, बताओ न, कौन छिपकर देखता है तुम्हें। किसी का ख़्वाब तुम्हारी नींद में आता होगा, बताओ न, कौन उस नींद से जगाता है तुम्हें। तुम कभी तो किसी बात पर झुँझलाती होगी, बताओ न, कौन फिर मनाता है तुम्हें। धन्यवाद 🙏 अमरेंद्र कर्ण...
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