ख़्वाबों की ज़मीं
ख़्वाबों की ज़मीं भी दरारों से भरी नज़र आई है, मुद्दतें बीत गईं, बारिश की न उम्मीद नज़र आई है। भीगी ज़मीं पर पनपते थे उम्मीदों के नए रंग, सूखे में हर कली, हर कोपल मुरझाई है। इंतज़ार है बेसब्री से गिरती एक मख़मली फुहार का, जैसे पपीहे को फिर अपनी प्यास याद आई है। कभी तो आएगी बादलों को याद रेगिस्तान की, तसल्ली बस इतनी ही ख़ुद से ख़ुद को दिलाई है। उफ़क़ पे आज भी नज़रें टिकी हैं मेरी, हर उड़ती घटा में एक आस समाई है। जानती हूँ देर से ही सही, रहमत ज़रूर बरसेगी, फ़ितरत तो बादलों की भी आशिक़नुमाई है। जब भी बरसेंगे मोती, ज़ख़्म-ए-ज़मीं महकेगी, सूखी धरा फिर से हरियाली से चमकेगी। ख़्वाबों की ज़मीं भले दरारों से भरी हो आज, उम्मीद ने अब तक रहमत की डगर नहीं भुलाई है।
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