हज़ार बार किया इंतिज़ार, अब आए
हज़ार बार किया इंतिज़ार, अब आए गुज़र गई जो शब-ए-ग़म तो यार, अब आए न पूछ हाल-ए-दिल-ए-ज़ार ऐ रफ़ीक़-ए-वफ़ा, गुज़र गई है शब-ए-इंतिज़ार, अब आए। मिरी तलाश में निकले न थे कभी लेकिन, मिरी तलाश हुई आश्कार, अब आए। गुलों ने ओढ़ लिया है लिबास-ए-पतझड़ जब लिए हुए हैं वो बू-ए-बहार, अब आए। न जाने कितने समंदर निगल गई तिश्नी, लबों पे आ गया जब आबशार, अब आए। कहाँ थी याद मिरे दर्द-ए-बे-दवा की उन्हें, हुआ जो ख़ुद पे सितम आश्कार, अब आए। कहाँ थे आप जब इक-इक नफ़स अज़ाब हुआ, कहाँ थे आप, मिरे ग़म-गुसार, अब आए। बसाँ-ए-शम्अ जला हूँ शब-ए-फ़िराक़ में मैं, हुई है सुब्ह तो परवाना-वार, अब आए। मिरी ग़रीबी-ए-दिल का ख़याल कब था उन्हें, नहीं है कोई भी जब उनपे रोज़गार, अब आए। फ़ुग़ान-ए-शौक़ ने दरबार तक रसाई की, हुआ जो बंद दर-ए-शहरयार, अब आए। अजब नहीं कि दुआ भी बदल गई हो अब, बहुत किया था भला इंतिज़ार, अब आए। मिरी फ़क़ीरी पे हँसते रहे जो उम्र तलक, लुटा जो उनका भी दार ओ मदार, अब आए। न थी ख़बर कि जुदाई भी एक मौत है दोस्त, उतर गया है जब उसका ख़ुमार, अब आए। रही है ख़ाक-नशीनी नसीब 'तन्हा' के, हुआ जो ख़त्म ग़मों का ग़ुबार, अब आए। कहाँ तलक कोई 'तन्हा' किसी को याद करे, कटी है उम्र सर-ए-इंतिज़ार, अब आए। तारिक़ अज़ीम तनहा
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