मिट्टी शरमाई है।
सूखे हुए दरख़्तों पर दूब फिर उग आई है, बारिश की ख़बर भर से मिट्टी शरमाई है। उड़ जाती थी अब तक संग हर हवा के झोंकों के, अब दुल्हन बनी हरियाली ख़ुद से ही शरमाई है। बाट जोहती बादल की, अरमान लिए बैठी थी, सावन की पहली दस्तक से धरती शरमाई है। सूखी नदियों के होंठों पर फिर गीत उतर आए हैं, बूँदों की छुअन पाकर हर लहर शरमाई है। प्यासे पत्तों ने ओढ़ लिया मोती-सा श्रृंगार नया, ओस की पहली चूनर में कली-कली शरमाई है। महकी-सी पुरवाई लेकर सावन आँगन उतरा है, प्रियतम के आने की ख़ुशबू से अमराई शरमाई है। सूखे हुए दरख़्तों पर दूब फिर उग आई है, बारिश की ख़बर भर से मिट्टी शरमाई है।
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