रुस्वा न करे इश्क़ को दुश्मन,
रुस्वा न करे इश्क़ को दुश्मन, उसे कहना रखना है मुहब्बत का भी दामन, उसे कहना वीरान मिरे घर में है बचपन उसे कहना लौटा दे अगर चाहे वो आँगन उसे कहना महफ़िल में तिरी हो जो मिरा ज़िक्र-ए-सुख़न तो रखता है मुझे ज़िंदा मिरा फ़न, उसे कहना आँखों ने कई बार लिखे हिज्र के क़िस्से पढ़ ले कभी अश्कों का ये दर्शन, उसे कहना शब भर जो तड़पता है वो दीवाना-ए-दिल है उलझा हुआ रहता है बहुत मन उसे कहना पत्थर से भला दिल को बचाए भी तो कब तक बरसाए कभी प्यार की चिलमन, उसे कहना महफ़िल में बहुत लोग हैं बस उसके दिवाने होता नहीं हर शख़्स मुहिब्बन, उसे कहना हर सिम्त तिरी याद का फैला है गुलिस्ताँ वीरान नहीं है मिरा गुलशन, उसे कहना हर मोड़ पे तक़दीर ने तड़पाया है मुझको आसान नहीं होता है जीवन, उसे कहना हर ज़ख़्म ज़माने का हुनर बन के खुला है दुश्वार नहीं दर्द का दर्पन, उसे कहना तन्हा की ग़ज़ल आज भी महकी है उसी से ख़ुशबू है मिरी जान का बंधन, उसे कहना Tariq Azeem Tanha | तारिक़ अज़ीम तनहा
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