बेनकाब
बेनकाब ======= तु समजता ही नही, हर बार तेरी मक्कारी की सजा, मैनै कभी राम बनकर, तो कभि किष्ण बणकर, हर युग मे दी है. तु है कि माणताही नही, तु मक्कार और तेरे कर्म़ गद्यार है, ऐसे कैसे कीस माॅंके कोख जाना है तु,, ऊसकाभी नाम बदनाम करने चला है तु. इतनी बार बेनकाब होणे से तु. ..... संभल जाता, लेकीन एक नंबरका गद्यार है तु, भेडीये से भी बत्त्तर है तु. मै भी आने वाला कली अवतार हु, आब एक बार और सही...., अब नकाब नही खीचुंगा...., अब कि बार तेरा पुरा खेलही, खल्लास कर डालुंगा..., पुरा खेलही खल्लास कर डालुंगा. ======================
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