मौन संघर्ष
जब-जब काम पुकारा गया, मैंने हर फ़र्ज़ निभाया । जो संभव था, वो किया मैंने, जो न हुआ, उसे भी आज़माया मैंने। कभी किसी काम के लिए मना नही किया , पर आपने हर बार जलील ज़रूर किया । हर आवाज़ पर हाज़िर रही , कभी किसी बात से इंकार न किया | अपना वक़्त, अपनी मेहनत देकर, हर ज़िम्मेदारी का भार लिया। पर अफ़सोस, क़दर न मिली, न समझा किसी ने मेरा समर्पण | मैं अपनी ताक़त काम में लगाती रही, वो शब्दों से करती रही मेरा खंडन | शायद मैं ही नादान थी, जो दिल जीतने की आस लगाए रही| न सम्मान मिला, न मिलने की उम्मीद, बस ख़ामोशी में हर चोट छुपाए रही। मैं जितनी मेहनत उनके कामों में करती हूँ, वो उतनी ही मेहनत अपने शब्दों में करती है, और हर बार मुस्कान के पीछे छुपकर, मुझे भीतर तक तोड़ देती है।
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