मासूम मुफ़लिस
असहज़ हो जाती हूँ मासूम मुफ़लिस को देख, बिसात नहीं कि कुछ कर पाऊँ। हाँ मगर, ऐ मालिक, मेरी सिफ़त का एक क़तरा उसे ज़रूर मुक़द्दर करना।
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