है सुरक्षित नारी कहाँ?
है सुरक्षित नारी कहाँ, ज़रा ये भी बतलाओ। जन्म लिया तो मातम छाया, खेलते देखा लड़कों संग तो मन घबराया। आराम किया जब लड़कों ने, लड़की ने घर चमकाया, आधी रात दिए की बाती में पढ़कर अपना मन बहलाया। स्कूल–कॉलेज में अव्वल आई तो लोगों को खटकाया, बदतमीज़ और बेशर्म नज़रों ने हर मोड़ पर उसको सताया। सब करती रही नज़रअंदाज़, अपना एक मुकाम बनाया, विभाग में भी शातिर लोगों ने फिर उसको डराया। सपने सजाए एक नए आशियाने के, उसने उस घर को मन से अपनाया, लेकिन दहेज की पैनी धार ने पहले उसको खुद पर चलना सिखाया। हुई विदाई जैसे-तैसे, पहुँची डोली ससुराल तब ध्यान आया, बिलखते छोड़ आई कर्ज़ों के बोझ तले माँ-बाप, भाई-बहन को, फिर भी खुद को समझाया। बेबस, लाचार हुई अत्याचारों से नए घर के लोगों के व्यवहार से, पर अपनों की खातिर उसने हर सच को छुपाया। रस्सी हो या आग की लपटें, सबको आँसुओं संग गले लगाया। अब बताओ,, क्या यही है सम्मान देवियों का, जहाँ देवी के त्योहार मनाए जाते हैं? या यह अभिमान है उन पाखंडियों का, जो खुद को देवी भक्त बताते हैं? और हाँ,, है सुरक्षित नारी कहाँ, ज़रा ये भी बतलाओ।
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