लाल कैदी
लाल दीवारों में कैद है ये तन, काली लकीरों से बंधा है ये मन। सर घुटन में, साँसे है कम, जिंदा हु मैं बस नाम का इंसान। खून की स्याही से लिखी ये दास्तां, दर्द ने छीन ली मुझसे मेरी मुस्कान जो था मेरा,वो पराया है अब, और जो था पराया,वही साया है अब। हाथों से रोका है चीखों का सैलाब, आँखों में सूखा पड़ा है आंसुओं का तालाब। लोग कहते हैं " बोल,हल्का हो जाए", कैसे बोलूं? लफ़्ज़ भी दर्द से घबराए। काले धागों में उलझा हर अरमाँ, लाल रंग में डूबा मेरा असमा। न दिन मेरा ,न रात मेरी बस सजा काटती हर बात मेरी। मैं खुद से ही पूछता हु सवाल कब खत्म होगा ये दर्द का साल? जवाब देता है मेरा ही अक्स "तू जिंदा है यही है तेरा श्राप। ये पिंजरा लोहे का नहीं ,यकीन का है जो मैने खुद अपने हाथों से बिना है , अब टूटी है जंजीर,पर पैर कहां उड़ने की ख़्वाहिश भी मर गई है यहाँ, आख़िरी शेर में बस इतना बयाँ न जीने की ज़िद है,न मरने का ज्ञान। बस लाल और काले की दरमिया एक लाश चलती है मेरे नाम से यहां।
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